अपनी छाप बनके जो मैं पी के पास गई- २
जब छाप देखी पिहू के सो मैं अपनी भूल गई
हो.....
छाप तिलक सब छीन ली रे मोसे नैना मीलाके -३
नैना मिला के मोसे नैना मिलाके
नैना मिला के मोसे नैना मिलाके
नैना मिला के... छाप तिलक छीन ली रे
ये रे सखी मैं तोसे कहू मैं तोसे कहू
मैं जो गई थी पनिया भरन को....
पनिया भरन को, पनिया भरन को
छीन झपट मोरी मटकी पटकी
छीन झपट मोरी मटकी पटकी रे मोसे नैना मिलके
छाप तिलक सब.......
बल बल जाऊं मैं
बल बल जाऊं तोरे रंगरेजवा
बल बल ....बल बल तोरे रंगरेजवा
अपनी सी.. अपनी सी..२
अपनी सी रंग लीनी रे मोसे नैना मिलके
छाप तिलक ....
ये रे सखी मैं तोसे कहू मैं
हरी हरी चुरियाँ हरी चुरियाँ
गोरी गोरी बहियाँ २
हरी हरी चुरियाँ गोरी बिया
बहियाँ पकड हर लीनी -2
बहियाँ पकड हर लीनी रे मोसे नैना मिलके
छाप तिलक सब छीन ली रे मोसे नैना मिलके
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(यह जगप्रसिद्ध गीत-कविता या जो भी कहें अमीर खुसरो की है। यह लिखकर कि इस गीत के सृजनकर्ता खुसरो थे... शब्दों की बर्बादी करने का एहसास हो रहा है, क्योंकि अचेतन सहज ही मानकर चल रहा है कि यह सबको पता होगा कि छाप तिलक... खुसरो का लिखा है, क्योंकि यह गीत इतना पापुलर है, लिहाजा इसके रचनाकार की जानकारी भी सहज ही होगी... ऐसा मन में लगता है।
साबरी बंधु का गाया हुआ छाप तिलक... कुछ दिनों से ज्यादा सुन रहा हूं। जितना ज्यादा इसे सुन रहा हूं, उतना ज्यादा इसकी परतें खुलती महसूस होती जा रही हैं। पैरलल चलते दो अर्थ...। एक तो जो गीत में कहा जा रहा है... और दूसरा...
अच्छा हुआ जो मटकी फोड़ी...। क्योंकि बहुत कठिन है डगर पनघट की...। प्रेमभटी का मधुवा पिलाइके...। मोहे सुहागन कीजे...।
कुछ-कुछ समझ आ रहा है सरकार...। दिमाग ही सही, लेकिन मस्ती में झूमने लगा है... बल-बल जाऊं मोरे रंगरेजवा...। प्रेमभटी का मधुवा पीने की मेरी भी बड़ी तमन्ना है, क्योंकि सूखापन (बौद्धिकता) भी मेरे अंदर उतना ही ज्यादा है। मेरे भीतर का थार-सहारा जाने कब से तरस रहा है, पता नहीं...।
एक और बात... निजामुद्दीन औलिया के चेले खुसरो ही हिंदी और ऊर्दू के जनक थे मुझे नहीं मालूम था। यह दावा मैंने भाषायी लड़ाई पर आधारित एक आर्टिकल में पढ़ा। उसकी लिंक नीचे है...
साबरी बंधु का गाया हुआ छाप तिलक... कुछ दिनों से ज्यादा सुन रहा हूं। जितना ज्यादा इसे सुन रहा हूं, उतना ज्यादा इसकी परतें खुलती महसूस होती जा रही हैं। पैरलल चलते दो अर्थ...। एक तो जो गीत में कहा जा रहा है... और दूसरा...
अच्छा हुआ जो मटकी फोड़ी...। क्योंकि बहुत कठिन है डगर पनघट की...। प्रेमभटी का मधुवा पिलाइके...। मोहे सुहागन कीजे...।
कुछ-कुछ समझ आ रहा है सरकार...। दिमाग ही सही, लेकिन मस्ती में झूमने लगा है... बल-बल जाऊं मोरे रंगरेजवा...। प्रेमभटी का मधुवा पीने की मेरी भी बड़ी तमन्ना है, क्योंकि सूखापन (बौद्धिकता) भी मेरे अंदर उतना ही ज्यादा है। मेरे भीतर का थार-सहारा जाने कब से तरस रहा है, पता नहीं...।
एक और बात... निजामुद्दीन औलिया के चेले खुसरो ही हिंदी और ऊर्दू के जनक थे मुझे नहीं मालूम था। यह दावा मैंने भाषायी लड़ाई पर आधारित एक आर्टिकल में पढ़ा। उसकी लिंक नीचे है...
http://www.lekhni.net/1593434.html
खुसरो के और कलाम पढऩे के लिए यहां नीचे क्लिक करें...
http://www.hindisamay.com
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